बांसवाड़ा। क्रांति ज्योति और स्त्री शिक्षा के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाली महामना सावित्रीबाई फुले की जयंती शनिवार को बांसवाड़ा के कंधारवाड़ी स्कूल में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। इस अवसर पर उपस्थित अतिथियों और शिक्षाविदों ने उनके सामाजिक योगदान को याद करते हुए नारी शिक्षा के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कार्यक्रम की शुरुआत सावित्रीबाई फुले की तस्वीर पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर की गई।
मुख्य अतिथि क्रांतिकारी कवि अशोक मदहोश ने काव्य पाठ करते हुए सावित्रीबाई फुले के कृतित्व और व्यक्तित्व को शब्दों में पिरोया और उनके संघर्षपूर्ण जीवन को प्रेरणास्रोत बताया।
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नरेश माही ने कहा कि आज भारतीय राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, विज्ञान और सामाजिक आंदोलनों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी सावित्रीबाई फुले की विरासत का प्रमाण है। महिला राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, कलेक्टर, विधायक, मंत्री, प्रोफेसर, सरपंच और जमीनी स्तर की महिला नेता उसी ऐतिहासिक संघर्ष की लाभार्थी हैं, जिसकी शुरुआत बुनियादी शिक्षा की लड़ाई से हुई थी।
उन्होंने कहा कि सावित्रीबाई फुले भले ही संवैधानिक लोकतंत्र को देखने के लिए जीवित न रहीं हों, लेकिन भारत का संविधान उनकी भावना को अपने भीतर समेटे हुए है।
गांधी दर्शन लेखक भारत दोसी ने कहा कि सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा के प्रसार के लिए अनेक कष्ट सहे, लेकिन कभी रुकी नहीं। यही कारण है कि लगभग 200 वर्षों बाद भी उनका नाम सम्मान और प्रेरणा के साथ लिया जाता है।
ओबीसी अधिकार मंच के नगर अध्यक्ष लक्ष्मीकांत भावसार ने कहा कि भारत की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने शिक्षा को केवल जानकारी तक सीमित न रखकर संस्कार, नैतिकता, राष्ट्रभक्ति, मानवता और प्रकृति से जुड़ाव का माध्यम बताया। उन्होंने चिंता जताई कि आज शिक्षित व्यक्ति अपनी शक्ति सृजन और कल्याण के बजाय विध्वंस में लगा रहा है, जो शिक्षा के मूल उद्देश्य के विपरीत है।
कार्यक्रम में राहुल वाधवानी, ओमप्रकाश वाधवानी, विपिन सारागिया, कालूलाल सहित अनेक गणमान्य नागरिक, शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।














